माखन चोर नहीं, वितरक और रुक्मिणी हरण नहीं, वरण

माखन चोर नहीं, वितरक और रुक्मिणी हरण नहीं, वरणभारतीय संस्कृति में श्रीकृष्ण केवल एक ऐतिहासिक या पौराणिक व्यक्तित्व नहीं हैं, वे जीवन-दर्शन हैं, संवेदना हैं, करुणा हैं और समाज-सुधार की चेतना हैं। उनकी बाल-लीलाएँ जहाँ वात्सल्य और प्रेम की गंगा बहाती हैं, वहीं उनके जीवन-प्रसंग सामाजिक न्याय, समानता और मर्यादा की प्रेरणा देते हैं। ग्राम भुक्ता/सरिया में आयोजित हरिवंश पुराण पाठ के चतुर्थ दिवस के अंतर्गत प्रस्तुत “श्रीकृष्ण बाललीला और रुक्मिणी हरण” विषय ने इसी शाश्वत सत्य को उजागर किया कि श्रीकृष्ण न तो माखन चोर थे और न ही रुक्मिणी का हरणकर्ता । वे तो माखन के वितरक और रुक्मिणी के वरणकर्ता थे। लोकमानस में प्रचलित अनेक कथाएँ भावनाओं से जुड़ी हैं, लेकिन उनका तात्त्विक और सामाजिक अर्थ समझना भी उतना ही आवश्यक है। जब कथा व्यास पं. भावेश कृष्ण जी महाराज ने व्यासपीठ से यह कहा कि “श्रीकृष्ण माखन चोर नहीं, माखन वितरक थे”, तब यह वाक्य केवल एक कथन नहीं था, बल्कि समाज के लिए एक दर्पण था।माखन चोर नहीं, माखन वितरक :ब्रज की गलियों में नटखट कान्हा की छवि अत्यन्त प्रिय है – मटकी फोड़ते हुए, माखन खाते हुए, ग्वालिनों से उलाहना सुनते हुए, परन्तु इस बाल-लीला के भीतर छिपा हुआ सामाजिक संदेश अत्यन्त गूढ़ है। चोरी का अर्थ होता है – छिपकर, भय से, अंधकार में, अन्यायपूर्वक किसी की वस्तु का हरण करना। परन्तु श्रीकृष्ण का माखन-प्रसंग तो इसके विपरीत था। वे न दिन छिपकर जाते थे, न भय से। वे तो अपने सखा-समूह के साथ दिन के उजाले में, हँसते-खेलते ग्वालिनों के घर पहुँचते थे। यह कोई व्यक्तिगत स्वार्थ नहीं था। यह तो करुणा का अभियान था। उस समय अनेक ग्वालिनें माखन को बाजार में बेचकर धन कमाने में लगी रहती थीं, किंतु अपने ही बच्चों को पौष्टिक आहार से वंचित रखती थीं। परिणामस्वरूप ब्रज के बालक कुपोषण का शिकार हो रहे थे। बाल-गोपाल श्रीकृष्ण ने यह देखा। उनका हृदय द्रवित हो उठा। उन्होंने सखाओं की टोली बनाई – “माखन वितरण टोली” और उन्हीं घरों का मटका फोड़ा, जिनके बच्चे इस टोली में सम्मिलित थे। यह चोरी नहीं थी, यह सामाजिक न्याय था। यह शोषण के विरुद्ध बाल-विद्रोह था। यह करुणा का क्रान्तिकारी रूप था। इसलिए श्रीकृष्ण को माखन चोर कहना उनके चरित्र के साथ अन्याय है। वे तो पहले समाजवादी थे, पहले पोषण-अभियन्ता थे, पहले बाल-कल्याण अधिकारी थे। वे यह सिखाते हैं कि धन संग्रह से बड़ा है मानव-संवेदनाओं का पोषण।भजन की पुकार – जीवन की नाव और श्रीकृष्ण का हाथ :कथा के मध्य में जब भजन मण्डली ने सुमधुर स्वर में समर्पण और भावपूर्ण प्रार्थना की -“ पकड़ लो हाथ बनवारी, नहीं तो डूब जायेंगे ।
हमारा कुछ न बिगड़ेगा, तुम्हारी लाज जायेगी ।।
पड़ी मझधार में नैया, खिवैया कोई नहीं मेरा ।
खिवैया आप बन जाओ, नहीं तो डूब जायेंगे ।।
पकड़ लो हाथ बनवारी – – – .
लदी है पाप की गठरी, वजन पापों का भारी है ।
यह गठरी आप सम्भालो, तो बेड़ा पार हो जाए ।।
पकड़ लो हाथ बनवारी – – – .तब यह केवल भजन नहीं रहा। यह जीवन की पुकार बन गया। संसार-सागर में डूबते मानव के लिए श्रीकृष्ण ही एकमात्र नाविक हैं। माखन वितरण की लीला भी यही सिखाती है कि जब समाज का सन्तुलन बिगड़ता है, तब ईश्वर बाल रूप में भी हस्तक्षेप करते हैं।रुक्मिणी हरण नहीं, रुक्मिणी वरण :रुक्मिणी प्रसंग को भी समाज ने अक्सर “हरण” कहकर गलत रूप में प्रस्तुत किया है। वास्तव में यह प्रेम, स्वेच्छा और नारी-सम्मान का अद्भुत उदाहरण है। रुक्मिणी विदर्भ की राजकुमारी थीं। उनका विवाह बलात् शिशुपाल से तय किया जा रहा था। यह राजनैतिक गठबंधन था, किन्तु रुक्मिणी का हृदय श्रीकृष्ण में बस चुका था। उन्होंने श्रीकृष्ण को स्वयं पत्र लिखा – यह स्त्री-साहस का अद्भुत उदाहरण है। उन्होंने लिखा कि वे तन, मन, धन, पन, वचन और आचरण से उन्हें ही अपना पति मान चुकी हैं। श्रीकृष्ण ने उस पत्र को स्वीकार किया। वे रुक्मिणी को चुराने नहीं गए, वे रुक्मिणी की रक्षा करने गए। वे स्त्री की इच्छा का सम्मान करने गए। वे अधर्म के बन्धन से मुक्त कराने गए। रुक्मिणी स्वयं श्रीकृष्ण के रथ पर बैठीं। यह अपहरण नहीं था, यह वरण था – प्रेम का वरण, धर्म का वरण, सत्य का वरण।
यह प्रसंग बताता है कि श्रीकृष्ण स्त्री-सम्मान के सबसे बड़े प्रतीक हैं। वे नारी को वस्तु नहीं, व्यक्तित्व मानते हैं। वे उसकी इच्छा को सर्वोपरि रखते हैं।इन दोनों प्रसंगों से जीवन के अनेक सूत्र निकलते हैं – करुणा ही धर्म है। श्रीकृष्ण सिखाते हैं कि केवल पूजा ही धर्म नहीं, अपितु भूखे को भोजन देना भी धर्म है। सम्पत्ति नहीं, संवेदना का वितरण करो। माखन को बाँटना बताता है कि जो हमारे पास है, उसे समाज के साथ साझा करना ही सच्चा मानव धर्म है। नारी की इच्छा सर्वोपरि है। रुक्मिणी प्रसंग स्त्री-स्वतंत्रता का सनातन उद्घोष है। प्रेम साहस माँगता है। रुक्मिणी ने समाज और सत्ता के विरुद्ध खड़े होकर प्रेम का चयन किया। ईश्वर अन्याय के विरुद्ध खड़े होते हैं। चाहे वह कुपोषण हो या बलात विवाह – श्रीकृष्ण हर शोषण के विरुद्ध खड़े हैं।श्रीकृष्ण की लीला केवल कथा नहीं, जीवन का पाठ है। वे बाल रूप में समाज-सुधारक हैं, युवा रूप में प्रेम के रक्षक हैं और योगेश्वर रूप में धर्म के संस्थापक हैं। माखन की मटकी फोड़ते हुए वे अहंकार तोड़ते हैं और रुक्मिणी का वरण करते हुए वे नारी के आत्मसम्मान की रक्षा करते हैं। आज के युग में भी जब बच्चे कुपोषण से जूझ रहे हैं और अनेक बेटियाँ अपनी इच्छा के विरुद्ध निर्णयों में बाँधी जा रही हैं, तब श्रीकृष्ण की ये दोनों लीलाएँ दीपक बनकर मार्ग दिखाती हैं। वे कहते हैं – भूखे को भोजन दो, भयभीत को साहस दो, और प्रेम करने वालों को सम्मान दो। श्रीकृष्ण माखन चोर नहीं – वे समाज के पोषक हैं। वे रुक्मिणी हरणकर्ता नहीं – वे प्रेम के वरदाता हैं। इसीलिए वे केवल भगवान ही नहीं, युग-पुरुष भी हैं और उनकी लीला केवल कथा ही नहीं, अपितु जीवन का शाश्वत संदेश भी है।
जय श्रीकृष्ण।डॉ. गौतमसिंह पटेल ‘सालर’
(अनुसंधेय रचनाकार : वरिष्ठ साहित्यकार : स्वतंत्र पत्रकार) सारंगढ़-बिलाईगढ़,छत्तीसगढ़.
