गारे-पेलमा सेक्टर-1 में प्रस्तावित पर्यावरणीय जनसुनवाई को लेकर विरोध तेज, प्रशासनिक रवैया बना आक्रोश का कारण

गारे-पेलमा सेक्टर-1 में प्रस्तावित पर्यावरणीय जनसुनवाई को लेकर विरोध तेज, प्रशासनिक रवैया बना आक्रोश का कारण
रायगढ़ जिले के गारे-पेलमा सेक्टर-1 में प्रस्तावित कोयला परियोजना की पर्यावरणीय जनसुनवाई को लेकर आदिवासी समुदाय और प्रभावित ग्रामीणों का विरोध लगातार तेज होता जा रहा है। परियोजना से विस्थापन और पर्यावरणीय नुकसान की आशंका को लेकर ग्रामीण बीते कई दिनों से गांधीवादी तरीके से शांतिपूर्ण धरना-प्रदर्शन कर रहे हैं। लेकिन प्रशासन की ओर से जारी एक हालिया आदेश ने इस शांत आंदोलन को और अधिक उग्र बनाने का काम कर दिया है। अब मामला सिर्फ स्थानीय विरोध तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसकी आवाज राजधानी रायपुर से लेकर दिल्ली तक पहुंच चुकी है।
धरने में शामिल 14 ग्रामों के ग्रामीणों ने अपनी ज़मीन, जल-जंगल-जमीन और आजीविका पर मंडरा रहे खतरे को लेकर स्पष्ट रूप से कहा है कि वे बिना न्यायपूर्ण समाधान के किसी भी कीमत पर जनसुनवाई होने नहीं देंगे। धरने में महिलाओं और बच्चों की संख्या अधिक है, जो संघर्ष की पीड़ा और असल चिंता को दर्शाता है। तीसरे दिन-रात से लगातार जारी यह आंदोलन इस बात का प्रतीक है कि ग्रामीण समुदाय का धैर्य अपनी सीमा पर पहुंच चुका है।
धरना स्थल धौराभाठा में सुबह-शाम सैकड़ों की भीड़ जुट रही है। ग्रामीणों का कहना है कि जनसुनवाई के नाम पर उनकी ज़मीनें कौड़ियों के मूल्य पर छीनी जा रही हैं, जबकि पुनर्वास और मुआवजे को लेकर कोई स्पष्ट नीति सामने नहीं लाई गई। दूसरी ओर प्रशासन ने जनसुनवाई हर हाल में संपन्न कराने की मंशा के तहत पूरे छत्तीसगढ़ से भारी संख्या में पुलिस बल तैनात कर दिया है, जिसने आम जनता में भय और अविश्वास की भावना पैदा कर दी है।
गांव के बुजुर्गों का कहना है कि इतनी भारी पुलिस तैनाती ने यह संदेश दे दिया है कि सरकार जनता की नहीं, बल्कि कंपनी की पक्षधर है। शांतिपूर्ण आंदोलन को सुरक्षा का विषय बताकर उसे दबाने की कोशिश लोकतांत्रिक मूल्यों के विपरीत है। ग्रामीणों ने प्रशासन पर यह आरोप भी लगाया है कि वे संवाद की जगह दमन का रास्ता अपना रहे हैं, जो समस्या को हल करने के बजाय और गंभीर बना सकता है।
धरने में शामिल युवाओं ने सवाल उठाया है कि यदि परियोजना सच में लोगों के विकास के लिए है, तो फिर उससे प्रभावित लोगों को विश्वास में क्यों नहीं लिया जा रहा? गाँव की महिलाएँ कई किलोमीटर दूर से धरना स्थल पहुंचकर यह बताती हैं कि यह लड़ाई सिर्फ जमीन की नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के अस्तित्व की है।
चौंकाने वाली बात यह है कि इस पूरे आंदोलन के बीच खुद को जनता का हितैषी कहने वाले कई जनप्रतिनिधि पूरी तरह गायब हैं। स्थानीय विधायक, सांसद और पंचायत प्रतिनिधियों की अनुपस्थिति ने लोगों के आक्रोश को और बढ़ा दिया है। ग्रामीणों का कहना है कि चुनाव के समय दरवाज़े-दरवाज़े घूमकर वोट मांगने वाले नेता आज जनता के सबसे बड़े संकट के समय साथ छोड़कर खामोश हैं।
धरना अब एक निर्णायक मोड़ पर पहुंचता दिखाई दे रहा है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार आम जनता की आवाज़ सुनेगी या परियोजना हितों को तरजीह देगी। फिलहाल, गारे-पेलमा के संघर्षरत ग्रामीणों की उम्मीद सिर्फ न्यायपूर्ण समाधान और सरकार की संवेदनशीलता पर टिकी है।
