कविता /इन आँखों में

कविता /इन आँखों में ,,,
इन आँखों में दर्द भरे थे बरसों
भीगी पलकों में थी कसक
चारों तरफ थे उजाले
मगर मेरे होंठो म न थी चमक
टूट सा गया था ये मन
जब थम सा गया था पल
अपनों ने दिलाई विश्वास
लौट आया फिर मेरी आस
वह पल है मुझे बस याद
जब रो पड़ा था मेरा विश्वास
दो कदम चला था हंस कर उम्मीद से
फिर हुई जीत उस रात
छांव नहीं ,हवा नहीं बस पेड़ खड़ा था मेरे पीछे उस रात
चारों तरफ थे उजाले
इन आँखों में ,,, न थी बस अहसास
लक्ष्मी नारायण लहरे ‘साहिल,
साहित्यकार पत्रकार
कोसीर सारंगढ़
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