February 14, 2026

dainik

RAIGARH ANCHAL

वन अधिकार अधिनियम की अनदेखी, आदिवासी विकास विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल

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वन अधिकार अधिनियम की अनदेखी, आदिवासी विकास विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल

“रायगढ़ का आदिवासी विकास विभाग
समिति गठन में देरी से वन अधिकार पट्टों के निराकरण में बाधा, आदिवासी ग्रामीणों में आक्रोश

रायगढ़, छत्तीसगढ़ — “नौ दिन चले अढ़ाई कोस” कहावत को यदि आज के प्रशासनिक ढांचे में कोई सही साबित कर रहा है, तो वह है रायगढ़ जिले का आदिवासी विकास विभाग। विभाग की सुस्ती और गैर-जवाबदेही का ताजा उदाहरण है अनुभाग स्तरीय समिति के गठन में एक महीने से अधिक की देरी, जिसकी वजह से सैकड़ों आदिवासी परिवारों के सामुदायिक और व्यक्तिगत वन अधिकार (FRA) के दावों का न तो परीक्षण हो पा रहा है और न ही निराकरण।
दिनांक 05 मई 2025 को अनुविभागीय दण्डाधिकारी (एसडीएम) घरघोड़ा द्वारा पत्र क्रमांक 1064/आर/2025/1064 के माध्यम से आदिवासी विकास विभाग रायगढ़ को निर्देशित किया गया था कि FRA के अंतर्गत प्राप्त आवेदनों के निराकरण हेतु अनुभाग स्तरीय समिति का गठन किया जाए। इसका उद्देश्य था कि अनुभाग स्तर पर लंबित सामुदायिक और व्यक्तिगत वन अधिकार के दावों की सुनवाई एवं निराकरण में तेजी लाई जा सके।
परंतु, दुर्भाग्यवश यह देखा गया है कि उक्त पत्र जारी होने के एक माह से अधिक समय गुजर जाने के बावजूद भी आदिवासी विकास विभाग रायगढ़ द्वारा समिति गठन की प्रक्रिया पूरी नहीं की गई है। यह न केवल शासन के आदेशों की अनदेखी है, बल्कि वन अधिकार कानून 2006 की मूल भावना के भी विपरीत है, जिसका उद्देश्य आदिवासी और वन आश्रित समुदायों को उनके पारंपरिक अधिकारों की विधिक मान्यता देना है।
इस देरी का खामियाजा भुगत रहे हैं घरघोड़ा, लैलुंगा, धरमजयगढ़, और खरसिया जैसे आदिवासी बहुल क्षेत्रों के हजारों ग्रामीण, जिन्होंने वर्षों से जंगलों पर निर्भर रहकर जीवन यापन किया है। सामुदायिक वन अधिकार के तहत ग्राम सभाओं द्वारा पारित प्रस्ताव लंबे समय से कलेक्टोरेट और वन विभाग के कार्यालयों में धूल खा रहे हैं। वहीं व्यक्तिगत पट्टा के लिए आवेदन करने वाले आदिवासी परिवारों को अब सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं।
लैलुंगा ब्लॉक के एक ग्रामीण कमलेश राम केरकेट्टा का कहना है, “हमने फरवरी से लेकर अप्रैल तक ग्रामसभा में सामुदायिक वन अधिकार का प्रस्ताव पास किया था। उसके बाद पटवारी और वन रक्षक आए, कुछ कागज लिए और चले गए। अब कहते हैं कि समिति नहीं बनी, तो सुनवाई कैसे होगी। हमें सिर्फ आश्वासन मिलता है, अधिकार नहीं।”
वन अधिकार अधिनियम 2006 के अंतर्गत आदिवासी परिवारों को न केवल उनके पारंपरिक निवास और खेती की जमीन पर कानूनी हक मिलना चाहिए, बल्कि सामुदायिक संसाधनों—जैसे जंगल, जल स्रोत, चारागाह आदि—पर भी अधिकार मिलना चाहिए। पर जब समिति ही नहीं बनेगी, तो परीक्षण और स्वीकृति की प्रक्रिया कैसे आगे बढ़ेगी?
सरकार द्वारा ग्राम पंचायतों को डिजिटल पोर्टल के माध्यम से आवेदन की प्रक्रिया दी गई है, लेकिन ग्रामीणों को इंटरनेट, दस्तावेज़, और भाषा की समस्या के कारण भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे में विभागीय निष्क्रियता एक तरह से उनके अधिकारों की हत्या के समान है।
यह प्रश्न अब गंभीर हो चला है कि क्या यह देरी प्रशासनिक अड़चन है या जानबूझकर की गई उपेक्षा? क्योंकि एसडीएम स्तर से आदेश दिए जाने के बावजूद विभाग की ओर से कोई सकारात्मक पहल नहीं की गई है। समिति गठन जैसे सरल प्रशासनिक कार्य को यदि एक माह से अधिक समय लग रहा है, तो इससे बड़े निर्णयों की कल्पना करना ही कठिन है।
समाजसेवियों, जनप्रतिनिधियों, और स्थानीय संगठनों ने इस मुद्दे पर प्रशासन से मांग की है कि अनुभाग स्तरीय समिति का गठन अविलंब किया जाए और इस देरी के लिए जिम्मेदार अधिकारियों के विरुद्ध कारण बताओ नोटिस जारी किया जाए। साथ ही ऐसे सभी ग्रामों की सूची तैयार की जाए जहाँ सामुदायिक और व्यक्तिगत वन अधिकार के दावे लम्बित हैं, ताकि उनका शीघ्र निराकरण हो सके।
वर्तमान परिस्थिति यह दर्शाती है कि जब तक सरकारी तंत्र सक्रिय और जवाबदेह नहीं बनेगा, तब तक आदिवासी समुदाय अपने अधिकारों के लिए यूं ही भटकते रहेंगे। आदिवासी विकास विभाग रायगढ़ को चाहिए कि वह अपनी संवैधानिक और कानूनी जिम्मेदारी निभाते हुए लंबित कार्यों को प्राथमिकता से पूरा करे। वरना यह “नौ दिन चले अढ़ाई कोस” की कहावत यूँ ही बार-बार दोहराई जाती रहेगी।

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