ग्राम पंचायत सचिवों के शासकीयकरण का सपना और नेताओं की वादाखिलाफी

ग्राम पंचायत सचिवों के शासकीयकरण का सपना और नेताओं की वादाखिलाफी
रायगढ़ – ग्राम पंचायत सचिव वर्षों से अपने शासकीयकरण की मांग कर रहे हैं। जब भी चुनाव नजदीक आते हैं, नेता बड़े-बड़े वादे करते हैं—कहते हैं कि सरकार बनते ही सचिवों को शासकीय कर दिया जाएगा। मंचों से घोषणाएं होती हैं, मीटिंग्स में आश्वासन दिए जाते हैं, और सचिवों को उम्मीद की किरण दिखती है। लेकिन जैसे ही चुनाव खत्म होते हैं, वही नेता जो सचिवों के साथ वादे करते थे, पद और सत्ता संभालते ही अपने वचनों से मुकर जाते हैं। मंत्री बनते ही वे सचिवों की पीड़ा और वर्षों की सेवा को भूल जाते हैं।
यह वादा खिलाफी नहीं, बल्कि सचिवों के साथ एक प्रकार का छलावा है। वे जो ज़मीनी स्तर पर प्रशासन की रीढ़ हैं, जिनके बिना पंचायत व्यवस्था चरमरा जाती, उन्हें सिर्फ चुनावी मोहरा बनाकर छोड़ दिया जाता है। आखिर कब तक सचिवों को ऐसे ही ठगा जाएगा? क्या उनका समर्पण, मेहनत और सेवा इस योग्य नहीं कि उन्हें स्थायी और शासकीय दर्जा दिया जाए? सरकार को चाहिए कि वह अपने वादों को निभाए और सचिवों को उनका हक दे। अब समय आ गया है कि झूठे वादों की जगह न्याय और सम्मान की राजनीति हो।
