April 16, 2026

dainik

RAIGARH ANCHAL

बहारों के नज़ारों को कभी तुमने निहारा

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बहारों के नज़ारों को कभी तुमने निहारा है,
सिसकती इस ज़मी के दिल कभी तुमने संवारा है।

जिधर देखो चिमनियों से निकलते राख के बादल,
हमारा शांत रहना ही तबाही का इशारा है।

नदी को ताल को हमने नहीं छोड़ा तबाही से,
इसे बरबाद करने हाथ तो मेरा तुम्हारा है।

अगर तुम सोचते होगे उसे तौहीन कर दूंगा,
निखर कर सामने होगा चमकता वो सितारा है।

हमें जो सांस देती है उसी को काटते हैं हम,
उसे पूछो बिना पेड़ों के जीवन जो गुजारा है।

न कोई ग़म न कोई रंज दोशीजा रवानी में,
मजे में है हमेशा ही अभी तक जो कुंवारा है।

अगर तुम सोचते होगे हमरा कुछ नहीं होगा,
ज़मी जो पांव नीचे है कहो मत ये हमारा है।

दलाली से किसी की बर कभी हमने न लुटवाया,
भले भूखा रहे जीवन फकीरी में गुजारा है।

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