साहित्य सृजन श्रेष्ठ रचनाकार सम्मान “से श्रीमती सुषमा पटेल सम्मानित

साहित्य सृजन संस्थान रायपुर छत्तीसगढ़ द्वारा आयोजित वृंदावन हॉल में महिला दिवस का विशेष कार्यक्रम महिला काव्य संध्या आयोजित की गई। जिसमें अंचल की प्रतिष्ठित कवियित्रियों की रचनाओं से सदन गुंजायमान हुआ । कार्यक्रम की मुख्य अतिथि प्रख्यात राष्ट्रीय कवियत्री कुसुम सिंह “अविरल” कानपुर से इस विशेष कार्यक्रम में उपस्थित रही।विशिष्ट अतिथि छत्तीसगढ़ की ख्यातिप्राप्त वरिष्ठ कवियत्री संतोष झांझी भिलाई, शोभायमान रही। कार्यक्रम की अध्यक्षता संस्था के अध्यक्ष वीर अजीत शर्मा ने की।कार्यक्रम को सुचारू रूप से चलाने ने संस्था के सचिव योगेश शर्मा “योगी,”सक्रिय रहे।
साहित्य सृजन संस्था द्वारा फरवरी माह के सम्मान “साहित्य सृजन श्रेष्ठ रचनाकार सम्मान “से श्रीमती अर्पणा द्विवेदी “अंजन “,बिलासपुर एवं श्रीमती अनिता शरद झा,रायपुर को सम्मानित किया गया । मंच महिला उत्सव और होली की रंग बिरंगी फुहारों से भरी रचनाओं से सुसज्जित हुआ। अतिथि महिलाओ को संस्था की कार्यकारिणी महिला सदस्यों ने तिलक लगाकर और माला पहनाकर सम्मानित किया । पुरुष वर्ग को भी तिलक लगा कर सम्मानित किया गया। कार्यक्रम का संचालन ममता खरे मधु जी द्वारा किया गया। विशिष्ट अतिथि के साथ साथ करीब बयालीस महिला रचनाकारों ने अपना अद्भुत काव्य पाठ किया।
कार्यक्रम में 8 वर्षीय कु.समृद्धि यादव ने महाभारत की द्रौपदी की व्यथा को अपने मधुर और करुण स्वर में प्रस्तुत कर इस विशेष कार्यक्रम में और चार चांद लगा दिए ।
सभी महिला रचनाकारों की प्रस्तुति एक से बढ़कर एक थी सभी ,की कविताओं ने सदन की खूब तालियां बटोरी ।
प्रस्तुत है कार्यक्रम में शामिल कुछ कविताओं की झलकियां :
मैं तो परियों सी यू ही उड़ती फिरू।
मेरी मां का मुझपे अभी हाथ जो है ।
मैं तो गुड़ियों सी सजती धजती।
मेरी मां का मुझपे अभी हाथ जो है।
फिरोजा ख़ान कोरबा
आओ मेरे टल्लू सैंया, छोड़ो हाथ मेरी बैयां,
पिचकारी रंग भर, दौड़ तो लगाइये।
उड़े हैं गुलाल होली, मियां बीवी संग टोली, लटकें बाहर पेट अब न हिलाइये।।
सुषमा पटेल
देहरी की अल्पना,मन की भावना, बेटियां द्वार की वंदनवार सी है…
घर की खुशियां चहकती महकती सी है, बेटियां मंदिरों की गुहार सी है…
कभी डोली चढ़ी, कभी अर्थी उठी, चार कंधे लगे आंख आंसू भरी,
बेटियां कीर्ति है हारती नकभी, जीवन के समर में विजय द्वार सी है….
कुसुम सिंह अविचल, कानपुर
ऋतु बसंत का आ गया,मन हर्षित हे आज।
घोड़ी चढ़ कर आ रहा, बनकर वर ऋतु राज।।
पल्लवी झा,रूमा
पन्ने जो पलटे सदियों के मैंने
कहीं देवी कहीं दासी ही थी मैं
बंधे और बिंधे मन -प्राण थे मेरे
अंतर की गहरी उदासी ही थी मैं।।
अर्पणा अंजन बिलासपुर।
तुम कहो तो हम उजालों में तुम्हारी मुस्कुरा लें।
गर तुम्हें इन्कार हों तो मुंह अंधेरों में छुपा ले।
कंठ पर पाबंदियां है और सुरों पर बंदिशें
गर इजाजत हो तुम्हारी गीत कोई गुनगुना ले।
उस झरोखे पर जो ठहरा एक टूकडा़ धूप का ,
तुम कहो तो खिड़कियों को खोलकर भीतर बुला लें।
सन्तोष झांझी भिलाई
सृष्टि समाई है जिसमें वो शक्ति की निशानी है,
नारी तेरी इस जग में अद्भुत अमर कहानी है।
फूलों की कोमल काया सी पर सृष्टि कहाती है नारी।
जग को जीवन देती है मौत भी तेरी बलिहारी।।
ममता खरे मधु
मुझ संग फाग न खेलोगे साजन,
तो किसी को रंग लगाने ना दूंगी।
बांध रखूंगी माघ महीने को
फागुन महीने को आने ना दूंगी।।
विजया पांडे
इधर कवि हैं उधर शायरा है टोली में,
गजब का रंग चढ़ेगा जी आज होली में।
ग़ज़ल औ मुक्तको के रंग भर के लाए हैं,
अजब अजब के रंग सबकी झोली में।।
पंखुरी मिश्रा
तुम ही हो सृष्टि की रचयिता वंश बढ़ाया तुमने सभी का
सीता सावित्री से निकलकर अब बन गई भगवत गीता
तुम ही शक्ति दायिनी हो ममता की तुम संचारिणी हो
हरियाली धरा पर तुम ही बिखेरो वसुंधरा तुम जग में प्रेम उड़ेलो।
शुभा शुक्ला निशा
जाने कितने ही रूपों में नारी,
जीवन को तुमने ढाला है,
कभी बनी मूर्ति सौम्यता की,
तो कभी रणचंडी बन मोर्चा संभाला है।
भारती यादव मेघा


