July 16, 2026

dainik

RAIGARH ANCHAL

विश्व आदिवासी दिवस के नाम पर आदिवासी संगठनों ने किया शक्ति प्रदर्शन…

1 min read
Spread the love

विश्व आदिवासी दिवस के नाम पर आदिवासी संगठनों ने किया शक्ति प्रदर्शन…

आदिवासियों के हितों से परे राजनीति की बलि चढ़ी आदिवासी दिवस…

आज भी आदिवासी जंगल और पारिस्थितिकी (eco system) के सबसे अच्छे संरक्षक है… अधिवक्ता चितरंजय पटेल

दुनिया भर में पहला विश्व आदिवासी दिवस 9 अगस्त 1995 को मनाया गया, और तब से आज तक हर साल, संयुक्त राष्ट्र दुनिया के आदिवासी लोगों से संबंधित एक विशेष मुद्दे को उजागर करने के लिए एक विषय का चयन करता है।
इसी क्रम में विश्व आदिवासी दिवस २०२४ का विषय “स्वैच्छिक अलगाव और प्रारंभिक संपर्क में आदिवासी लोगों के अधिकारों की रक्षा” है।
संयुक्त राष्ट्र के अनुसार आज दुनिया में स्वदेशी लोगों के लगभग २०० समूह स्वैच्छिक अलगाव और प्रारंभिक संपर्क के बिना रहते हैं। वे मुख्य रूप से सुदूर वन क्षेत्रों में रहते हैं जो खनिजों और अन्य प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध हैं।
यहां, स्वैच्छिक अलगाव का मतलब है कि वे अपनी अलग सांस्कृतिक और जातीय पहचान बनाए रखने के लिए मुख्यधारा की आबादी के साथ स्वयं घुलना-मिलना पसंद नहीं करते हैं। वे अभी भी शिकार और वनोपज संग्रहण पर निर्भर हैं, जो उनकी संस्कृति की एक विशिष्ट विशेषता है।
कृषि, खनन,उद्योग आदि के तथाकथित विकास के कारण उनके वन क्षेत्रों में कटाई बढ़ गई है, जिससे उनकी आजीविका और उनकी विशिष्ट संस्कृति को खतरा है,फलस्वरुप इस वर्ष का थीम “आदिवासी लोगों के अलगाव और प्रारंभिक संपर्क में ना रहने के अधिकारों की रक्षा के साथ उनकी विशिष्ट संस्कृति को संरक्षित करने पर केंद्रित है।” पर आज विश्व आदिवासी दिवस के दिन अलग अलग आदिवासी संगठनों ने सर्व आदिवासी समाज के हितों से जुड़े जल, जंगल और जमीन के मूल अधिकारों से परे अपने अपने राजनीतिक आकाओं के इशारे पर शक्ति परीक्षण का इतिहास रचते नजर आए जो निश्चित रुप से भविष्य में मूल आदिवासी समाज के लिए छलावा व घातक ही साबित होगा।
इस संबध में चर्चा करते हुए राष्ट्रीय मानवाधिकार एवं सामाजिक न्याय आयोग लीगल सेन के प्रदेश अध्यक्ष एवम् उच्च न्यायालय अधिवक्ता चितरंजय सिंह पटेल ने कहा कि आज विश्व आदिवासी दिवस २०२४ के ध्येय “स्वैच्छिक अलगाव और प्रारंभिक संपर्क में आदिवासी लोगों के अधिकारों की रक्षा” से हटकर राजनीतिक स्वार्थों पर विमर्श ज्यादा नजर आया जबकि देश में, खासकर छत्तीसगढ़ में जब औद्योगिक क्रांति के नाम पर आदिवासियों के रहवास, संस्कृति व उनके इको सिस्टम पर लगातार हमले हो रहे हैं जबकि आज भी आदिवासी जंगल और पारिस्थितिकी के सबसे अच्छे संरक्षक हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Copyright © All rights reserved. | Newsphere by AF themes.